रविवार, 14 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता राजनैतिक पाखण्ङ

धर्मनिरपेक्षता राजनैतिक पाखण्ङ
घर-घर जाकर पूँछा, किसी ने अपने को इस्लाम, किसी ने हिन्दु, किसी ने ईसाई और किसी ने सिख धर्म का अनुयायी बताया, अपने आपको। मैने उन्हे धर्मनिरपेक्ष होने को कहा पर कोई तैयार न हुआ और मेरी बात पर लोग मरने मारने का तैयार हो गये। लोगों ने यहाँ तक कहा कि हम जान दे सकते हैं पर, अपना धर्म नहीं त्याग सकते हम धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं और न होना चाहते है, हम अपना धर्म मानते हैं और दूसरों के धर्म का आदर करते हैं। सोचिए जरा, धर्म न मानने वाले मुट्ठी भर धर्मनिरपेक्ष लोग धर्मवान लोगों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ठग कर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं और धर्मप्रिय जनता धर्मनिरपेक्षता का अर्थ भी नहीं समझ पाई अभी तक।

शनिवार, 30 मार्च 2013

ङर क्यों लगता है ?


ङर क्यों लगता है  ?
      कुछ दिन से लगातार समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीङिया में लगातार मुलायम सिंह जी का यह कथन  कि ‘‘ काँग्रेस धोखेबाजों की पार्टी है,’’ पढने-सुनने मिल रहा है ।प्रश्न यह खङा होता है कि जब श्री मुलायम सिंह जी यह सब जानते हैं और यदि उन्हें धोखेबाज लोग पसंद नहीं तब, वह धोखेबाजों या धोखेबाज पार्टी को अपना समर्थन क्यों दे रहे हैं ? जानबूझकर किसी अनैतिक या अपराधिक पृवति के व्यक्ति या संगठन को कोई नीतिवान व्यक्ति तो साथ नहीं देता फिर, आखिर मुलायम सिंह जी की ऐसी क्या मजबूरी है कि काँग्रेस को धोखेबाज पार्टी जानते और मानते हुए भी पूरी बफादारी के साथ समर्थन दिये जा रहे हैं ? कहा जाता है कि संगी साथियों के आधार पर किसी व्यक्ति के  व्यक्तित्व का आकलन आसानी से किया जा सकता है फिर, जब मुलायम जी खुलकर काँग्रेस की गोद में खेल रहे हैं, तब आम आदमी इससे उनके व्यक्तित्व के विषय में क्या अनुमान लगाये और क्या निष्कर्ष ले ?
      मुलायम जी कांग्रेस पर हमला बोल  यह भी कहते हैं  कि ‘‘कांग्रेस  डराकर समर्थन लेती है.’’ उन्‍होंने कहा, 'मैंने सरकार का बुरे वक्त में साथ दिया लेकिन बदले में मेरे पीछे सीबीआई लगा दी गई. डीएमके के साथ भी सरकार ने यही किया था- समर्थन के बदले कनिमोड़ी को जेल भेज दिया गया.'।  मुलायम   सिंह जी के इन व्यानों से सामान्य से सामान्य आदमी यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि मुलायम सिंह जी जैसे वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता  को  काँग्रेस  या  सी.बी. आई. का भला  क्या ङर हो सकता है यदि , उन्होने कोई गलती या अपराध नहीं किया है ?  फिर यह  कहना भी अनुचित नहीं होगा कि दवाया या ङराया उसे जा सकता है जो कही किसी भी बात पर गलत हो । प्रश्न यह भी खङा होता है कि ममता बनर्जी, करूणानिधि जैसे नेता किस तरह अपनी मर्जी से काँगॆस का साथ छोङ अलग हो गये, उन्हें तो नहीं ङराया गया और न सी.बी.आई. उनका कुछ बिगाङ पाई । इस तरह अगर अनावश्क रूप से ङराकर काँगेस अपने लिए समर्थन जुटा रही  होती तो शायद देश में काँग्रेस से आज तक कोई समर्थन वापिस न लेता और न कोई काँग्रेस या सरकार का विरोध करने का साहस भी न कर पाता ।
        अन्ना और अरविन्द केजरीवाल और उनसे जुङे हजारों-लाखों लोग क्यों काँग्रेस या सी.बी.आई. से नहीं ङरते   और  कैसे लगातार हिम्मत और हौसले के साथ लगभग सभी दलों का विरोध करते हैं ।  जिसका मन निर्मल व स्वच्छ होताहै जो ईमानदार और चरित्रवान होता है ईश्वर उसका मार्गदर्शन करता है,उसे वाणी की मधुरता के साथ बुराई से लङने की शक्ति व आत्मबल देता है और ऐसा आदमी किसी से नहीं ङरता वह पूरी तरह निर्भीक और आत्म विश्वासी होता है। फिर मुलायम तिंह जी द्वारा काँग्रेस को धोखेबाज पार्टी मानते हुए भी काँग्रेस का समर्थन करना और यह कहना कि कांग्रेस  डराकर समर्थन लेती है, आम आदमी को कुछ  और सोचने को मजबूर कर देता है । एफ.ङी. आई. के मुद्दे पर मुलायम जी की करनी और कथनी का अंतर भी उनके व्यक्तित्व  को परिभाषित करने के लिए उचित शब्द चाहता है ।
  


सोमवार, 25 मार्च 2013

अब न भायें रंग


                    अब न भायें रंग मुझको , सब बनावट से बने,
                    प्रेम, सौहार्द, भाई चारा रह गये औपचारिक सब ।
                    खो दिये संस्कार हमने, इन्सानियत बदरंग हुई,
                    रो रहा है दिल तो मेरा, संवेदनाऐं अब मर रही ।
                    प्रेम है तो रंग है वरना शान्ति भंग है, 
                    मिल जुल रहें प्रेम से, मानवता का राज हो ।
                    प्रेम रंग छूटे कभी न, रंग दो संसार को,
                    कुछ रंग अब ऐसा भी ङालो, हँस पङे संसार अब ।

सोमवार, 18 मार्च 2013

      ज्ञान दो प्रकार का होता है। शास्त्र ज्ञान और अनुभवजन्य अर्थात् अनुभूत ज्ञान। शास्त्रों का ज्ञान दूसरों का अनूभूत ज्ञान है अर्थात् वह ज्ञान जो दूसरों ने कार्यानुभव के बाद  वर्णित या प्रतिपादित किया  है , जो स्दयं का अनूभूत ज्ञान न हो। बात हम आध्यात्मिक ज्ञान की कर रहे हैं। आज शास्त्रों का ज्ञान रखने वालों की संख्या बहुत अधिक है पर, अनुभूत ज्ञान धारण करने वाले विरले ही हैं और जो हैं वह अपने आपको गोपनीय रख्रकर लगातार प्रभु के सानिध्य में बने रहते हैं ,उन्हें  न तो अपने आपको प्रकट करने की आवश्यकता होती है और न वह प्रकट करते ही हैं। ऐसे ज्ञानी व्रम्हनिष्ट होते हैं। कहा गया है-
                          “ हरि दुरलभ नहीं जगत में हरिजन दुरलभ होय ।”
     बङे भाग्यशाली जीव होते हैं वह, जिन्हें ऐसे तत्ववेत्ता और व्रम्हनिष्ट संत का सानिध्य या दर्शन लाभ भी हो जाये। ऐसे सिद्ध पुरुष के बहुधा शिष्य कम होते हैं, और शिष्य बनाते भी हैं तो केवल तब जब शिष्य को योग्य पाते हैं। ऐसे तत्ववेत्ता और व्रम्हनिष्ट संतो द्वारा समय –समय पर अपने योग्य शिष्यों को अपना जो अनुभूत ज्ञान प्रदान किया गया  वही ज्ञान शास्र्  रुप में प्रकट होता चला आ रहा है।  शास्त्रों का ज्ञान  मात्र प्राप्त कर लेने से ईश्वर की  कृपा  हासिल नहीं होती और न इससे किसी के व्रम्हनिष्ट होने का अनुमान ही करना चाहिये वल्कि शास्त्रों द्वारा अनुशंसित साधना –विधि का कठोरता से पालन करने पर ही साधना की पूर्णता प्राप्त हो जाने पर ईश्वर की  कृपा से ही तत्व ज्ञान प्राप्त हो सकता है और ईश्वर ही अपनी अहैतुकी  कृपा कर अपना साक्षात्कार करा देता है और फिर भक्त को कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता –वह ज्ञानियों का भी श्रेष्ठ ज्ञानी हो  जाता है। भगवान ज्ञानी से अधिक अपने भोले और प्रेमी भक्तों को प्यार करते हैं, अगर ऐसा न होता तो मीरा, सूर , तुलसी , सबरी जैसे भक्तों को भगवान कभी न मिलते।
           हरे  कृष्ण  हरे  कृष्ण  कृष्ण  कृष्ण हरे  हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
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